✨ “आख़िर बहू ही बुरी क्यों?” ✨
बहू बुरी नहीं होती…
बस वो सबकी उम्मीदों का जोड़ नहीं बन पाती।
ससुराल में हर व्यक्ति की अपनी सोच होती है,
अपना नजरिया, अपनी कल्पना—
किसी को संस्कारी बहू चाहिए,
किसी को कम बोलने वाली,
किसी को कमाने वाली,
किसी को सेवा करने वाली,
और किसी को बस चुप रहने वाली…
पर एक इंसान
सबके दिमाग की बनाई तस्वीर कैसे बन सकता है?
जब बहू उन सब “अलग-अलग दिमागों” से मेल नहीं खाती,
तो उसे नाम दे दिया जाता है—
“बुरी बहू”।
सच तो ये है—
बहू सिर्फ ससुराल में बुरी कहलाती है।
मायके में वही बेटी अच्छी होती है।
दोस्तों में वही सच्ची होती है।
मोहल्ले में वही मुस्कुराती हुई दिखती है।
लेकिन घर के अंदर…
छोटी सी बात को बड़ा बना दिया जाता है,
आधी बात को पूरा कर दिया जाता है,
और फिर मोहल्ले में कहानी सुनाई जाती है—
“बहू बहुत बुरी है…”
इतना झूठ,
इतनी सजावट,
इतना बढ़ा-चढ़ा कर बयान—
कि सच कहीं कोने में चुप बैठ जाता है।
क्योंकि सच बोलने के लिए हिम्मत चाहिए…
और कहानी बनाने के लिए बस ज़ुबान
“बहू बुरी नहीं होती,
वो बस सबकी अलग-अलग उम्मीदों में फिट नहीं बैठ पाती।”
- archana