स्वार्थ के इस मेले में अब, रिश्ते कैसे परखे जाएँ,
साथ निभाने वाले ही अब, राहों में भटकाएँ।
मीठी मुस्कान के पीछे यहाँ, बरसों पुराने बैर छुपे,
कौन है अपना, कौन है पराया, हर चेहरे में ज़हर भरे।
नहीं है जानता कोई यहाँ, कौन किसका साया है,
अपनी ही राह चलना बेहतर, उम्मीद रखना माया है।
नहीं जानता कोई यहाँ, किसका कौन सा रिश्ता है,
अपनी ही मंज़िल खुद बनानी, बाकी सब माया है।
DHAMAK