पूछा हाल शहर का.. तो वो मुस्कुरा के बोलें
लोग तो जिंदा हैं, पर ज़मीरों का पता नहीं..!
ये हीजरांती बस्तियां, दिकते ये भूखे कहराते लोग
वो राशन का गेहूँ दे गई चंदे में,यहाँ अमीरो पता नहीं
बात मैने जो किसीको न बताई,वो फेल गई अखबारो में,
अपने तो अपने होते हैं ना,पर ये मुखबिरो का पता नहीं
कौन सी रहेमें,किसकी दुआ,किसकी नज़र बरसी हम पर, ,
जो हथेली में न खींची गई,वो अनजान लकीरों का पता नहीं
उलफतो से संवारे जो जेठा, इसके मायने तो समझे,
नफ़रतो से भी छूटने न दे, वो जंजीरो का पता नहीं