स्वामी विवेकानंद : शिकागो की गर्जना
सन् 1893, शिकागो का विशाल कोलंबस हॉल। चारों तरफ विद्वानों, पादरियों और दार्शनिकों की भीड़ थी। गेरुए वस्त्र पहने एक भारतीय युवक कोने में शांत बैठा था। उसके मन में उथल-पुथल थी, पर चेहरा स्थिर।
आयोजक ने आवाज दी, "अब भारत से स्वामी विवेकानंद अपना वक्तव्य रखेंगे।"
विवेकानंद मंच पर आए। हजारों आँखें उन्हें संदेह और कौतूहल से देख रही थीं। उन्होंने गहरी सांस ली और कहा, "मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों!"
इतना सुनते ही पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। दो मिनट तक तालियां रुकने का नाम नहीं ले रही थीं।
भाषण के बाद, जब विवेकानंद बाहर निकले, तो प्रोफेसर राइट ने उनसे पूछा, "स्वामी जी, आपने संबोधन में 'भाइयों और बहनों' ही क्यों चुना? यहाँ तो सब लेडीज एंड जेंटलमैन कह रहे थे।"
विवेकानंद मुस्कुराए, "प्रोफेसर, बाकी दुनिया के लिए संबंध औपचारिक हो सकते हैं, लेकिन मेरे भारत के लिए पूरा विश्व एक परिवार है। मैंने सिर्फ सत्य को पुकारा था।"
तभी एक अहंकारी विदेशी विद्वान पास आया और व्यंग्य से बोला, "साधु जी, आपके देश में तो इतनी गरीबी है, आप यहाँ धर्म की बात करने आए हैं? क्या धर्म पेट भर सकता है?"
विवेकानंद की आँखों में एक चमक उभरी, "महोदय, भूखे पेट धर्म नहीं किया जाता, यह सच है। लेकिन जिस संस्कृति के पास हजारों वर्षों का आध्यात्मिक धन हो, वह दरिद्र कैसे हो सकती है? हम रोटी मांगने नहीं, दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाने आए हैं।"
उस रात विवेकानंद को एक अमीर परिवार में ठहराया गया। मखमली बिस्तर और ऐशो-आराम देखकर उनकी आँखों में आंसू आ गए। उन्होंने खुद से कहा, "मेरे देश के लोग घास फूस की झोपड़ियों में सो रहे हैं और मैं यहाँ इस विलासिता में? हे माँ, क्या इसीलिए मैं यहाँ आया हूँ?"
अगले दिन, एक पत्रकार ने उनसे पूछा, "स्वामी जी, भारत को बदलने के लिए सबसे जरूरी क्या है?"
विवेकानंद ने दृढ़ता से जवाब दिया, "आत्मविश्वास। भारत को अपनी शक्ति पहचाननी होगी। उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।"
शिकागो की उस सभा ने दुनिया को बता दिया कि भारत का गौरव उसकी मिट्टी में नहीं, उसके विचारों में है। स्वामी जी ने न केवल हिंदुत्व का मान बढ़ाया, बल्कि मानवता को एक सूत्र में पिरोने का मंत्र दिया। उनके उस भाषण ने गुलाम भारत के सोए हुए स्वाभिमान को जगा दिया, जिसकी गूँज आज भी इतिहास के पन्नों में जीवंत है।