तस्वीर
घर में ' दीवाली कीथा सफाई करते - करते एक पुरानी तस्वीर हाथ लग गयी। वो तस्वीर में मुस्कुराती ' आँखो में सपने लिय कोई राजकुमार ' सालीनता , चहकता चेहरा कितनी खूबसूरत व सादगी भरा ' उस तस्वीर मे मैं जैसे खो सी गयी। क्या' दौर हुआ करता था। कितनी मधुरता हुआ करती थी ' रिश्तों में । कोई' भेद-भाव तुलनात्मक जीवन नहीं था। जो जैसा है। वैसा सही है। आस -पास
जात - पात ऊँच - नीच काम-काज में कोई भी नजरिया अलग नहीं था। उसी पर व्यक्ति धेर्य बांध कर जीता था।
डिप्रेशन नाम की कोई चीज नहीं थी। जिस लड़के के साथ विवाह कर दिया । उसी को अपना फर्ज अपना कर निभा लिया करती थी। (करते थे) दो समय की रोटी,
दो जोड़ी कपड़े ' सर के नीचे छत पर खुश रहता था।
ताजी हवा पानी का तो क्या कहना, रगो मे मिट्टी की खुशब कही भी बैठ जाओ। धरती माँ का एहसास होता । बस यू कहां जाये प्रकृति से जुड़ा हुआ हर व्यक्ति जो एक हिन्दूतानी होने पर गर्व महसूस करता था। तभी शकुनतला " की कोहनी से आईना नीचे गिर टूट गया।
शकुनतला की चेतना जागी ' मैं भी कहां खो गयी। आईने के टुकड़ों मे अपने आप को देखा , जितने आईने के टुकड़े हर एक टुकड़ा कुछ कहता था। जीवन मे तरह -तरह के रिश्ते निभाये ' तस्वीर से आईने मे झांका और देखा वही लड़की । जिसका चेहरा झाइयों से घिर गया। हर एक झाई में जीवन का तर्जुवा था। परिवार को पचास पचपन साल दिये । अन्त में वही आ गयी जहाँ से शुरू किया। मैं और मेरे पति महोदय । सालो साल हो जाते है। बेटे-बहू पोते पोती के मुँह देखे बिना विदेश मे नौकरी करने से ' लोगो की मानसिक सोच है। कामयाबी '
बेटी मेरी सोन चिड़ियां पंक्षी की तरह उड़ गयी। अपनी गृहस्थी से जब समय होता है। तब आना ' सारा घर काटने को दौड़ता है। अरे भाग्यवान आओ साथ मे खाना खाते हैं। मैने आलू पराठा बना लिया और साथ मे दही
जब तक श्वांस है तब तक तो साथ है। पति - शकुनतला अब थोड़ा मुस्कुरा दो, जिस मुस्कान पर मैं फिद हूं।