ये धड़कनें कह रही हैं तेरी ही हर अदा से,
तुझसे ही चल रही है सांसों की ये रवानी।
कभी ख़्वाब बन के आना, कभी सामने मिल जाना,
तुझको पढ़ा है मैंने, तू इश्क की किताब पुरानी।
ज़माने की भीड़ में भी तेरा चेहरा ही दिखे है,
तू मेरे हर जनम की इकलौती इक निशानी।
'दीप्तांश' की ग़ज़ल का तू ही मुकम्मल मज़मूँ,
तुझसे ही रंगीन है मेरी हर एक रुत सुहानी।