जिंदगी के दिन अब तो प्यार के बिना,
कट रहे हैं रोज़ बस गिन-गिन के दिन।
ना मोहब्बत ही मिली, ना मौत आई,
तन्हा ढलते रहे फिर जिंदगी के दिन।
आरज़ू का दीया बुझता भी नहीं,
उम्मीद है कि दिल से जाती ही नहीं।
दर्द सीने में छुपाए मुस्कुराते हैं,
राहत की कोई राह नज़र आती ही नहीं।
ना वफ़ा की कोई शाम मेहरबाँ हुई,
ना मौत ने ही गले से लगाया कभी।
साँस चलने की मजबूरी है साहब,
वरना ये दिल तो कब का सो गया होता कहीं।