अनकही कहानी
समय अपनी गति से चलता रहा,
हम भी उसके साथ चलते रहे।
मन में भावनाओं का सागर था,
हम ख़ामोशी से उसे सँभालते रहे।
सबकी भावनाओं को समझा हमने,
सबके मन की बात पढ़ते रहे।
वे हमारे बारे में क्या सोचते हैं,
इन्हीं सवालों में उलझते रहे।
दूसरों को पहचानते-पहचानते,
हम ख़ुद से ही अनजान हो गए।
सबके दर्द को अपना समझते हुए,
अपने ही दर्द से अनजान हो गए।
हमने सुनी सबकी कहानी,
हर दर्द को समझने की कोशिश की।
जब अपनी बात कहने की बारी आई,
तो किसी ने सुनने की ज़हमत न की।
जिन्हें अपना समझकर मन खोला,
जिनसे हर परेशानी साझा की,
जब हमें भी किसी अपने की चाह हुई,
तो ख़ामोशी ने ही हमसे बात की।
अब कैसे पहचानें अपनों को,
किसे अपना कहें, किसे पराया?
जिनके लिए हम हमेशा खड़े रहे,
उन्होंने ही हमें अनदेखा बनाया।
धीरे-धीरे हमने कहना छोड़ दिया,
मन की बातें मन में रखना सीख लिया।
जो शब्द कभी होंठों तक आते थे,
उन्हें ख़ामोशी में समेटना सीख लिया।
पर आज भी मन में सवाल उठता है,
क्यों कोई हमारी कहानी नहीं सुनता है?
क्या दूसरों का दर्द ही दर्द होता है,
क्या हमारा मन कुछ नहीं कहता है?
न जाने कितनी बातें अधूरी हैं,
न जाने कितने एहसास दबे हैं।
चेहरे पर भले ही शांति दिखाई दे,
मन में कितने अनकहे सवाल खड़े हैं।
समय अपनी गति से चलता रहा,
हम भी उसके साथ चलते रहे।
सबकी कहानी सुनते-सुनते,
अपनी कहानी ख़ुद से कहते रहे।
यह कैसी अनकही कहानी है,
जिसमें भावनाएँ तो बहुत हैं,
पर सुनने वाला कोई नहीं।
सबको समझने की कोशिश में
ख़ुद को समझने वाला भी कोई नहीं।