भावनाओं से परे जीवन
चाहा हमने,
नदी की धारा के जैसा जीवन हो,
उसमें समुंदर जैसी गहराई हो,
वसंत ऋतु जैसी बहार हो,
बारिश की बूँदों जैसी निश्चलता हो।
पर क्यों ये भावनाएँ
एक विशाल चट्टान की तरह
हमें ख़ुद के भीतर समेट लेती हैं?
क्यों इनके साये में
हम ख़ुद से ही दूर हो जाते हैं?
कभी डर है, कभी अकेलापन,
कभी दुख है, कभी एकांत,
कभी ऐसा लगता है
जैसे खो गए हों हम कहीं,
अपने ही जीवन के किसी अनजान मोड़ पर।
नहीं चाहिए हमें एकांत का वह डर,
जिसके साये में ख़ुद को ही खो दें हम।
हमें उन सायों से बाहर निकलना है,
अपने ही जीवन में ख़ुद को फिर से पाना है।
जब जीवन को समझना चाहा,
तो भावनाओं के अनेक रूप सामने आए।
जिन एहसासों से डरते रहे हम,
उनके अर्थ धीरे-धीरे समझ में आए।
हर भावना को जाना हमने,
हर एहसास को समझा हमने,
तब जाना कि कई बार
जिन भावनाओं से डरते रहे हम,
उन्हीं के कारण ख़ुद से दूर होते गए हम।
अब भावनाओं के साये में खोना नहीं,
अपने ही जीवन से दूर होना नहीं।
डर को समझकर उससे आगे बढ़ना है,
एकांत के साये से निकलकर
ख़ुद के साथ भी जीना सीखना है।
जीवन को नदी की तरह बहने देना है,
हर अनुभव को सहजता से सहने देना है।
मन में शांति, आँखों में सपने सजाकर,
अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ते जाना है।
भावनाओं को समझकर, ख़ुद को पहचानना है,
एकांत के डर से निकलकर
खुलकर अपना जीवन जीना है।