स्त्री नेस्तनाबूद करके रहेगी जालों को
पंजों के बल उचकती हैं स्त्री
कभी चढ़ जाती हैं
स्टूल,तिपाई या मेज पर
होने के लिए जमीन से कुछ बालिश्त ऊंचा
ताकि समेट सके उनको भी
जो हैं पहुँच के बाहर उसके
कमर में आँचल खोंसे
मुँह में भरे कुनेन
माथे पर देकर बल
जब उठाती है वह लक्ष्य भेदी झाडूं
आकाश सरक जाता है
थोड़ा और ऊपर
धरती धसक जाती है नीचे जरा और
मजबूती से बने तार
हो जाते हैं तार-तार
उसके मजबूत इरादों के आगे
उन्हें स्त्री बेहद पसंद है
बहुत पुराना है साथ उनका
स्त्री को वे बिलकुल अच्छे नहीं लगते
उसकी रात उनके सपनों से खत्म होती है
और सुबह उनकी तलाश से
वे भी कम खिलंदडे नहीं
खेलते हैं उससे
लुका-छिपी का खेल
छिपने के लिए नई से नई जगह
तलाश लेते हैं तलघर..कोनों
मर्तबानों ...कुर्सियों,पलंग के नीचे
मशीनों,पवित्र ग्रंथों ही नहीं
वे तो जा छिपते हैं देवताओं के पीछे भी
नहीं छिप पाते फिर भी उसकी तेज निगाहों से
शरण देने वाले देवता बेचारे भी
खा जाते हैं झाडूं की दो-चार मार
नेस्तनाबूद करके ही दम लेगी वह
उन जालों को
जो जड़ जमाए बैठे हैं
घरों
संस्कारों
ग्रंथों
और पूरी शताब्दी में |
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