प्रस्तुत है डॉ. रंजना जायसवाल की कविता "सवाल करती स्त्रियां" का अंग्रेजी अनुवाद जो उन संरचनाओं की गहरी आलोचना करती है, जो पितृसत्ता और पूंजीवाद के मेल से संचालित होती हैं। कविता स्त्रियों की स्वतंत्रता और उनके अधिकारों पर हो रहे निरंतर हमलों को उजागर करती है, जो कि एक पूंजीवादी समाज में अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं, जहां सामाजिक और आर्थिक सत्ता का नियंत्रण कुछ गिने-चुने हाथों में केंद्रित है।
यह कविता पूंजीवादी व्यवस्था की दोहरी नीति पर भी प्रहार करती है, जहां स्त्रियों की स्वतंत्रता की बात तो की जाती है, पर जब स्त्रियां वास्तव में स्वतंत्र होने की कोशिश करती हैं, तो उन्हें दबाने की हरसंभव कोशिश की जाती है। यह पूंजीवादी समाज की संरचनात्मक समस्या है, जहां शोषण और नियंत्रण के तमाम टूल्स होते हैं जिनके माध्यम से स्त्रियों की आवाज़ को दबाया जाता है।
कविता के अंतिम हिस्से में, "सवाल करती स्त्रियां" इस व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं, क्योंकि सवाल उठाना ही बदलाव की शुरुआत है। यह सवाल सत्ता के मौजूदा ढांचे को हिलाने की क्षमता रखता है और इसीलिए इन सवालों को कुचलने की कोशिश की जाती है। यह कविता इस व्यवस्था के व्यापक बदलाव के आह्वान के रूप में देखी जा सकती है, जो स्त्रियों के सवालों के माध्यम से एक नई, अधिक न्यायपूर्ण व्यवस्था की मांग करती है।
सवाल करती स्त्रियां
वे आज भी
निर्धारित करना चाहते हैं
कि स्त्री क्या करे
क्या ना करे
उसके जागने सोने
उठने बैठने
हँसने बोलने
पढ़ने लिखने
जीवन जीने
यहाँ तक कि प्रेम करने पर भी
अपना सिक्का चलाना चाहते हैं
वैसे तो वे स्त्री की स्वाधीनता की बात करते हैं
पर स्वतंत्र स्त्री को बर्दास्त नहीं कर पाते
स्वतंत्र स्त्री उनके लिए चरित्रहीन है
समाज के लिए घातक है
वे परिवार समाज
साहित्य संस्कृति
राजनीति धर्म
उस हर जगह से
जिसे अपने हित के लिए
गढ़ा है उन्होंने
ख़ारिज कर देना चाहते हैं
सामर्थ्य भर कर भी देते हैं
उन्हें घृणा की हद तक चिढ़ है
हर उस स्त्री से
जो उनकी मुट्ठी की हद से फिसल जाती है
उनके दायरों को तोड़कर निकल जाती है
नकार देती है उनकी दोगली मान्यताओं को
तोड़ देती है उनकी तय नैतिकता को
सवाल करती है
उन्हें सवाल करती स्त्रियां अच्छी नहीं लगतीं।
-- डॉ. Ranjana Jaiswal
Questioning Women
In this enlightened epoch, so they claim,
They yearn to impose their sovereign decree,
To ordain what a woman may pursue,
And what she must, by duty, forsake or flee.
They seek dominion over her every breath,
Her waking hours and her nightly repose,
Her laughter, her discourse, her written thought,
Her very essence, her affections, her woes.
Though they extol the virtues of her liberty,
They cannot suffer her spirit unconfined,
For to them, a woman unshackled and free
Is a tempest, a danger to order designed.
From the hearthstone, from the sacred bounds,
From the citadels of culture and creed,
They endeavor to banish her questioning soul,
To silence her voice, to stifle her deed.
Their contempt is profound, their aversion vast,
For every woman who eludes their grasp,
Who shatters the chains of tradition's past,
And discards the mores they strain to clasp.
For a woman who questions, who boldly defies,
Who dares to unravel their sanctified lies,
Is a woman they cannot embrace or extol,
But face with dread in their narrowed eyes.
-- Translated by Nitin Tripath