भोर भई मोरमुगाँव में, चली समंदर की ठंडी बयार,
बाबू चाय वाले की भट्ठी पर सज गया आज दरबार।
केतली गावे खन-खन गाना, अदरक-इलायची की महक उड़े,
एक ही बेंच पे आके बैठे लोकतंत्र के तीन धुरंधर बड़े।
एक तरफ खादी का कुरता, माथे तिलक, चमकती मुस्कान,
झुककर बोले नेता जी—"अरे बाबू, कटिंग लाओ कड़क जान!"
दूजे कोने खाकी वर्दी, मूँछें तानी, तोंद महान,
दरोगा जी ने लाठी पटकी—"पहले इधर पिला, ओ बेईमान!"
तभी तीसरे साहब उतरे, काला चश्मा, सूट कमाल,
हाथ में लाल फ़ाइल भारी, चाल में पूरी ED की चाल।
घूर के देखा नेता जी को, खाकी ने भी खींची साँस,
बाबू बोला, "गज़ब तमाशा! आज मरेगी चाय की प्यास!"
नेता जी ने हाथ हिलाया, "अरे पधारो हुकुम हुज़ूर,
हम जनता के सच्चे सेवक, आप हुकूमत के मगरूर।
चुनाव सिर पर नाच रहा है, पर्चा हमने भर डाला,
पर आपके समन के डर से हर अफ़सर का मुँह काला।"
हँसकर बोले ED अफ़सर, "नेता जी, मत करो बखेड़ा,
तीन साल का बही-खाता सब मैंने आँख से हेरा।
सड़क बनी काग़ज़ पर केवल, गिट्टी खा गए, खा गए तार,
स्विस बैंक का वो खाता बोलो, किसका है वो गुलज़ार?"
नेता बोले तपाक से, "साहब, ये तो बस अफ़वाहें हैं,
जन-सेवा की खातिर ही तो हमने ठोकरें खाई हैं।
पैसा सारा चंदे का था, पार्टी कोष में जमा हुआ,
जितनी संपत्ति मेरी दिखती, सब पुरखों की दया हुआ!"
दरोगा जी ने मारी चुस्की, बिस्कुट चाय में डुबो दिया,
बोले, "अरे हुज़ूर, आपने तो सारा सस्पेंस खो दिया!
हम दिन-रात गश्त लगाते, चालान काटते सौ-पचास,
और नेता जी एक झटके में लूट लेते हैं पूरा खास!"
"अरे दरोगा!" नेता चमके, "ज़रा ज़बान पे रखो लगाम,
तुम्हारी जीप का पेट्रोल कहाँ से भरता है हर शाम?
रेत-माफ़िया, दारू-तस्करी, किसका हिस्सा बँटता है?
थाने की हर मेज़ के नीचे क्या सिर्फ़ चूहा कटता है?"
दरोगा झेंपा, खाँस के बोला, "साहब, व्यवस्था का फेर है,
हम तो बस मोहरे हैं छोटे, जंगल में तो शेर है!"
ED बोली, "शेर हो चाहे चीता, पिंजरे में सब आएँगे,
छापा अगर पड़ा सुबह तो तोते सब उड़ जाएँगे।"
नेता जी ने धीमे से फिर ED के कंधे पे हाथ रखा,
बोले, "साहब, हवा बदलो, काहे रखते इतना रुखा?
कल हमारी सरकार बनेगी, फिर कुर्सी पर हम होंगे,
आपकी ये फ़ाइलें जो आज हैं, रद्दी के गोदाम होंगे!"
ED मुस्कराई धीरे से, चश्मा नाक पे सरकाया,
"नेता जी, जब तक सरकार आपकी, तब तक तो सब माया।
पर दिल्ली का रुख़ अगर बदला, तो पहली गाड़ी आपकी,
हम तो बस तोते पिंजरे के, बोली बोलते साक़ी की!"
तीनों बैठे, तीनों हँस दिए, भेद किसी से छुपा नहीं,
चाय की चुस्की के आगे अब कोई भी रुखा नहीं।
नेता बोला, "बिल हम देंगे, सेवा का मौका तो दो!"
दरोगा बोला, "हफ़्ता कटवा के, बाक़ी का सिक्का तुम लो!"
ED बोली, "अरे छोड़िए, खाते में सब चढ़ जाएगा,
किसने किसको क्या खिलाया, काग़ज़ सब बतलाएगा।"
बाबू चाय वाला चुपचाप कोने में खड़ा मुसकाया,
बोला, "साहब, चाय के पैसे दो, बहुत ज्ञान छलकाया!
तुम तीनों मिलकर इस देश का ऐसा हलुवा बनाते हो,
एक चुराता, एक छुपाता, तीसरे डंडा दिखाते हो!"
ठहाका गूँजा चौराहे पर, धुआँ उड़ा उस भट्ठी से,
लोकतंत्र की कटिंग चाय सब गटक गए बड़ी सख्ती से।
नेता चला रैली करने, दरोगा जी नाके पर भागे,
ED की गाड़ी दौड़ पड़ी, नए समन के धागे बाँधे