हम कौन हैं?
क्या बताएँ तुम्हें,
जीवन एकांत हो गया है,
सब कुछ जैसे बदल गया है।
जो कभी उल्लास हुआ करता था,
वह भी कहीं खो गया है।
हर वक़्त ख़ुद से कहते हैं,
कौन हैं हम?
ज़रा हमें भी तो बताओ,
आख़िर कौन हैं हम?
हम तो नहीं जानते,
आख़िर कौन हो तुम।
हमने ख़ुद से ही कहा,
अच्छा, बताओ—कौन हो तुम?
हमने कहा,
हम कौन हैं,
कैसे बताएँ तुम्हें
कि कौन हैं हम?
नहीं पता हमें,
आख़िर कौन हैं हम।
हम खो गए हैं ख़ुद में,
फिर भी ख़ुद को खोज रहे हैं हम।
जानना चाहते हैं ख़ुद को,
समझना चाहते हैं ख़ुद को,
पर समझ नहीं आता
कि आख़िर क्या हैं हम।
कौन-सी राह है हमारी,
किस ओर जाना है हमें?
क्या तलाश रहे हैं हम,
क्या पाना है हमें?
सवाल तो बहुत हैं मन में,
पर उत्तर कोई मिलता नहीं।
ख़ुद को समझना चाहते हैं,
पर ख़ुद को समझ पाते नहीं।
आख़िर कौन हैं हम?
और क्या राह है हमारी?
ख़ुद को खोजते-खोजते,
कहीं खो न जाए पहचान हमारी।