✍️ मैं कवि तो नहीं..
मैं कवि तो नहीं, फिर भी कविता लिखता हूँ,
न छंदों और अलंकारों का ज्ञान,
न ही मुझे है काव्य की पहचान,
अपने अंतर्मन के भावों और विचारों को लिखता हूँ,
मैं कवि तो नहीं, फिर भी कविता लिखता हूँ।
सूर्य की पहली किरण को मैंने जीवन लिखा,
अस्त सूर्य की अंतिम किरण को जीवन का अंत लिखता हूँ,
मैं कवि तो नहीं, फिर भी कविता लिखता हूँ।
रात होते ही मैं पहुँच जाता हूँ आसमान में,
चाँद को राजा और तारों को उसकी प्रजा लिखता हूँ,
मैं कवि तो नहीं, फिर भी कविता लिखता हूँ।
फिर सुबह होती है और शाम आती है,
फिर दिन आता है और रात होती है,
दिन-रात के इस जीवन-चक्र से कुछ तो सीखता हूँ,
मैं कवि तो नहीं, फिर भी कविता लिखता हूँ।
✍️दलीप कुमार