तुम उस पन्ने पर क्यों नहीं हो,
जिस पन्ने पर उसने तुम्हें आख़िरी बार लिखा था?
क्या समय इतना सामर्थ्यवान है
कि स्मृतियों के अक्षर तो मिटा दे,
पर उन अक्षरों से जन्मे भाव नहीं?
या फिर मनुष्य भी एक यात्रा है,
जहाँ कुछ लोग साथ चलते-चलते बिछड़ जाते हैं,
और कुछ बिछड़कर भी भीतर जीवित रहते हैं।
आख़िर ऐसा क्यों होता है कि
किसी की कहानी में एक दिन हमारा अंत हो जाता है,
जबकि हमारी पूरी ज़िंदगी
उसी के आख़िरी पन्ने पर ठहरी रह जाती है?