कोई सूरज के बारे में क्यों नहीं लिखता,
हर ख़ूबसूरत चीज़ को चाँद से ही क्यों दिखता?
चाँद की ख़ामोशी को मोहब्बत का नाम मिल जाता है,
पर सूरज का उजाला अक्सर बस “रोशनी” कहलाता है।
चाँद तो ख़ुद भी किसी और की रोशनी से चमकता है,
फिर भी हर शायर के ख़्वाबों में वही दमकता है।
सूरज अपनी आग में जलकर भी दुनिया सँवारता है,
फिर क्यों उसकी तपिश को कोई ख़ूबसूरत नहीं पुकारता है?
शायद हमें ख़ूबसूरती में नर्मी ही नज़र आती है,
जो चीज़ हमें जलाए, उसकी क़ीमत समझ नहीं आती है।
चाँद दूर रहकर भी कितना अपना-सा लगता है,
और सूरज पास होकर भी आँखों को चुभता है।
मगर क्या ख़ूबसूरती सिर्फ़ वही है जो सुकून दे जाए?
क्या जो हमें रोशनी दे, उसे थोड़ा जलना भी न आए?
चाँद को चाहने वालों की कमी आज भी नहीं है,
बस कभी- कभी सूरज के हिस्से की तारीफ़ भी सही है।🌻☀️