पापा
हम माँ के बारे में तो लिखते हैं,
उनके जैसा कोई नहीं,
यह कहने में भी
शब्द कम पड़ जाते हैं।
पर पापा के बारे में
कभी लिखने का सोचा ही नहीं,
शायद इसलिए कि
उनके बारे में लिखना
हमें आता ही नहीं।
क्या लिखें उनके बारे में,
कैसे व्यक्त करें उनका साथ,
जो हर कठिन परिस्थिति में
बनकर खड़े रहे हमारे साथ।
हमारी ख़ुशी में ही
अपनी ख़ुशी ढूँढ़ते रहे,
पर कभी बताया नहीं,
कभी जताया नहीं
कि हमारी ख़ुशी में
वो भी खुश हैं।
कभी एहसास ही नहीं होने दिया
कि हम अकेले नहीं,
पापा भी साथ हैं हमारे।
माँ के जीवन को
शब्दों में ढालना कभी आसान लगा,
पर पापा के लिए
दो शब्द लिखना भी
न जाने क्यों इतना कठिन लगा।
आज एहसास हुआ
कि पापा के बारे में
लिखना मुझे कभी आया ही नहीं।
माँ के मन की भावनाओं को
शब्दों में ढाल दिया,
पर पापा के मन में क्या था,
उनकी भावनाएँ क्या थीं
यह हम कभी जान ही नहीं पाए।
शायद पापा ने भी
बहुत कुछ महसूस किया होगा,
बहुत कुछ कहना चाहा होगा,
पर हम उनके मन को
पढ़ ही नहीं पाए।
उनका साथ तो समझ आया,
उनका त्याग भी समझ आया,
पर उनके मन की ख़ामोशी
समझना कभी सीखा ही नहीं।