कभी-कभी हम
उनकी खूबियों के आदी हो जाते हैं,
और फिर उनसे दूर होना
इतना आसान नहीं होता।
हर ख़याल में वही ख़याल रहता है—
कि हम उन्हें क्यों दूर कर रहे हैं,
जिसे कभी अपना बनाया था,
उसे आज क्यों भुला रहे हैं?
भूलना ही था,
तो क्यों नहीं भुला दिया?
अपनाना ही था,
तो क्यों अपना नहीं लिया?
जब अपना बनाना नहीं था,
तो दिल में जगह क्यों दी?
और जब भूलना ही था,
तो इतनी याद क्यों दी?
जिसे भूलना चाहते हैं हम,
उसे भूलकर भी भूल नहीं पाते,
दूर होकर भी
दिल से दूर नहीं हो पाते हम।