इतना ही काफ़ी है।
लिखूँ जो तेरे लिए तो मशरूफ़ हो जाता हूँ,
बेरुख़ सी ज़िंदगी में इतना मशरूफ़ होना काफ़ी है।
वैसे तो लिखते-लिखते थम जाती है सोच मेरी तुझमें,
पर लिखी मैंने तुझपे कुछ नज़्में, काफ़ी हैं।
लबों से जो न कह पाया हूँ मैं, न तुम मेरी आँखों में पढ़ पाए हो,
समझ लो मेरे इन लफ़्ज़ों को, बस इतना समझना काफ़ी है।
बे-लुत्फ़ सी ज़िंदगी में भी लुत्फ़ आ जाता है,
बस आपका एक दीदार होना काफ़ी है।
क्या ज़रूरत है तुम्हें किसी हथियार की,
बस लगा लो अपनी आँखों में काजल, काफ़ी है।
क्यों जलाना है चाँद को, लगा लो एक छोटी सी बिंदी,
चेहरे पे तुम्हारे वो छोटा सा दाग़ ही काफ़ी है।
चाहो तो कस के बाँध लो ज़ुल्फ़ें तुम्हारी,
चेहरे पे लटक रही कुछ लटें ही काफ़ी हैं।
अगर नहीं पसंद तो मत रखो मुझे तुम्हारे दिल में,
मुझको रखने दो तुम्हें दिल में, उम्र भर काफ़ी है।
कौन कहता है ज़िंदगी मेरे नाम करो तुम्हारी,
चलने दो कुछ क़दम साथ तुम्हारे, काफ़ी है।
स्नेह ना सबंधो