खिड़की के उस पार .....
बस की खिड़की से शहर निहारती रही,
बूँदों के साथ हर तस्वीर सँवारती रही।
कहीं छत थी, कहीं छतरी का सहारा था,
कहीं बारिश में भी बस खुला आसमाँ प्यारा था।
कहीं चाय की प्याली, कहीं पकौड़ों की महक थी,
कहीं खिड़की के शीशे पर बूँदों की चमक थी।
पेड़ों की शाखों पर मोती झिलमिलाते रहे,
भीगी हवाओं में पत्ते गुनगुनाते रहे।
कहीं बच्चे बारिश में काग़ज़ की नाव चला रहे थे,
कहीं राहगीर छतरियों में घर जा रहे थे।
कोई इस मौसम को हँसकर अपना रहा था,
कोई भीगते हुए भी आगे बढ़ता जा रहा था।
फिर नज़र पड़ी एक ऐसे इंसान पर,
जिसके सिर पर छत नहीं थी उस आसमान पर।
सोचा - अगर उससे पूछूँ, “बारिश क्या होती है?”
क्या वो भी कहेगा, “ये मौसम की ख़ूबसूरती है”?
शायद उसके लिए ये बूँदें सुकून नहीं, सवाल थीं,
हर गिरती बूँद के पीछे कुछ मजबूरियाँ बेहिसाब थीं।
जहाँ किसी के लिए बारिश छुट्टी का बहाना था,
वहीं किसी के लिए रात गुज़ारना भी एक फ़साना था।
एक ही बादल था, एक ही आसमान था,
एक ही बारिश का हर तरफ़ सामान था।
किसी के लिए बूँदों में ख़ुशियों की बात थी,
किसी के लिए वही बूँदें एक मुश्किल रात थीं।
बस चलती रही, मैं खिड़की से देखती रही,
बारिश गिरती रही, दुनिया बदलती रही।
तब समझ आया इस छोटे-से सफ़र के बाद-
मौसम एक होता है, मगर उसका मतलब हर किसी के लिए अलग होता है।⛈️
~ Adya