कहानी शुरू करना इतना मुश्किल नहीं लगता,
जितना उसे ख़त्म करना लगता है!
शुरुआत में तो सब अच्छा है...
धीरे-धीरे सब आसान सा लगता है।
पता ही नहीं चलता कब कहानी का हिस्सा बीच में पहुँच जाता हैं,
फिर देखते हैं...
नैया डगमगा रही है, आगे बढ़ पाना मुश्किल लगता है।
धीरे-धीरे जब अंत के करीब आते हैं,
तब याद आता हैं कि कहानी की शुरुवात में हम अंत पता करना भूल जाते हैं
तब लिखने में बहुत मुश्किलें आती हैं,
समझ नहीं आता कैसे ख़त्म करें।
जिस आसानी से शुरुआत की थी,
उसी आसानी पर ख़त्म करना,
थोड़ा मुश्किल लगने लगता है।
पता नहीं कैसे अंत खोज के लाएँ?
यह सोच-सोच के दिमाग पूरा खपने लगता है।
जैसे-तैसे करके शब्द बटोरने पड़ते हैं,
तब जाकर कहीं कोई अंत नज़र आता है...
पता नहीं वह सही भी है या नहीं,
पर शुरुआत को अंत तक लाना, बड़ा मुश्किल लगता है!
ज़रूरी थोड़ी है हर चीज़ ख़त्म करनी पड़े?
पर फिर भी... सबको दिखाने के लिए ख़त्म करना ही पड़ता है,
वरना उम्मीदें लग जाती हैं—कि आगे और कुछ आने को है!
पर कैसे बताएँ?
लेखिका के पास अब कुछ नहीं बताने को हैं....
बड़ा मुश्किल होता है अंत लिखना, फिर भी अंत लिखना पड़ता है!
मैं चाहती नहीं कि अंत लिखूँ,
पर फिर भी मैं चाहती हूं
पता नहीं क्यों?
लेकिन मैं कहानी को अंत तक ज़रूर लाती हूँ!
ज़रूरी थोड़ी है कि हर कहानी ख़त्म हो...
पर मुझे फिर भी लिखना होता है,
पर सच में... बहुत मुश्किल होता है!
ओर अंत में मेरी लिखी... "सभी" कहानियों का यही हश्र होता है।