मेरे कमरे की खिड़की पर, एक पर्दा लगा है...
पर्दे को हटाऊँ, खिड़की खोलूँ,
तो उससे आसमाँ दिखता है!
उस आसमाँ में कितने बादल हैं...
रात हो, तो वहाँ तारे टिमटिमाते हैं,
और चाँद अपनी रोशनी लेकर पहुँच जाता है उसे चमकाने!
मेरी खिड़की का किनारा... बहुत तीखा है,
हाथ लगाओ तो कभी-कभी चुभ भी जाता है।
चुभ जाए... तो एक आह निकलती है,
जो मेरे ही कमरे में सुनाई देती है...
सुनाई भी कुछ इस कदर, कि गूँज ही पड़ती है आवाज मेरी,
जो लौटकर मेरे ही कान में आकर लगती है!
इतना खाली है कमरा मेरा... कि सच कहूँ तो,
मुझे खिड़की से दिखते आसमाँ से कभी - कभी जलन होने लगती है!
क्योंकि जितने तारे उसमें भरे हैं...
उतना ही खालीपन मुझे मेरे कमरे में लगता है।
बहुत खाली है कमरा मेरा,
इसलिए शायद मुझे खिड़की से दिखता आसमाँ अच्छा लगता है!
बहुत सुंदर है वह...
अच्छा लगता है उसे देखना, उसे निहारना,
वह मुझे पूरा करता है...
मेरे कमरे के खालीपन से, मुझे थोड़ा दूर रखता है।
मेरी खिड़की से दिखता आसमाँ...
कभी-कभी जलन के साथ, मुझे सुकून भी देता है!