हर इंसान की ज़िंदगी में एक ऐसा मोड़ आता है, जहाँ रास्ते सामने तो कई होते हैं, लेकिन साथ चलने वाला कोई नहीं होता। उस समय मन बार-बार पीछे देखता है—कौन मेरा हाथ पकड़ेगा, कौन मेरी बात समझेगा, कौन मेरे निर्णय पर विश्वास करेगा? और जब कोई उत्तर नहीं मिलता, तब भीतर एक डर जन्म लेता है। हमें लगता है कि शायद अकेले चलना हमारी मजबूरी है।