"शायद हम बड़े हो गए हैं"
आज सुबह सुबह जब बच्चों की पीठ में टंगे बस्ते और उनकी ड्रेस देखता हूँ... तो लगता है "शायद हम बड़े ही गए हैं"।
आज जब बच्चों को स्कूल ले जाने के लिए उनकी आया जी आवाज देती हैं तो भाग कर बाहर देखता हूँ और ढूँढ़ता हूँ कि उनकी आवाज में शायद मेरा भी नाम हो... पर... लगता है "शायद हम बड़े हो गए हैं"।
आज जब कोई बच्चा स्कूल जाने में रोता है, उसकी आँखों में आँसू और खूब सारी आवाज होती हैं... तो लगता हैं... "शायद हम बड़े हो गए हैं"।
आज जब दुकानों में बच्चे ₹5 लेके जाते हैं और दुकान वाले से कहते हैं - ₹1 की ये, एक रुपये की वो, अरे नहीं नहीं... ₹2 की ये वाली टॉफी... तो लगता हैं... "शायद हम बड़े हो गए हैं"।
आज भी जब पापा ऑफिस से घर आते हैं तो बच्चों का ये चिल्लाना "पापा आ गए, पापा आ गए"... सुनकर लगता हैं "शायद हम बड़े हो गए हैं"।
आज भी जब किसी बच्चे को माँ के हाथ से खाना खाते देखता हूँ... तो लगता हैं "शायद हम बड़े ही गए हैं"।
आख़िर आज भी ये सब सोचकर, देखकर लिखने बैठता हूँ तो रोता हूँ और देखता हूँ कि अब आँखों में केवल आँसू ही आते हैं, कोई आवाज नहीं...
तो शायद...
शायद नहीं अब यकीन हो जाता हैं कि हाँ, "सच में हम बड़े हो गए हैं"....
(कॉलेज टाइम के विचार)
_Shivam D.