ज़्यादा नहीं, बस थोड़ा...
मेरा तुझसे दूर होना ज़रूरी है.....
ज़रूरी है थोड़ा मेरा तुझसे दूर होना,
कभी-कभी मुझे तेरी बात खाती है...
ऐसा नहीं कि मुझे तुझसे इश्क़ नहीं,
ऐसा नहीं कि मुझे तुझसे इश्क़ नहीं!
पर कभी-कभी...
तेरे उन पुराने लफ़्ज़ों की बहुत याद आती है।
तू कहता रहा, तू कहता रहा...
कि परवाह है तुझको,
तू कहता रहा कि परवाह है तुझको...
पर दिखाने में थोड़ी कसर बाकी रख दी,
मैं कहती हूँ परवाह है मुझे.....
और मैंने तेरी ज़िंदगी के नाम, मेरी ज़िंदगी कर दी!
कैसे करूँ? कैसे करूँ बयाँ?
कितना मुकम्मल रहा है मेरा इश्क़ तुझसे...
पर खबर नहीं तुझको,
यह बात मुझे बहुत रुलाती है!
ज़रूरी है मेरा तुझसे थोड़ा दूर रहना,
कभी-कभी मुझे तेरी बात बहुत खाती है...
ऐसा नहीं कि मुझे तुझसे इश्क़ नहीं,
बस...तेरे लफ़्ज़ों की याद आती है!