ये जो तुम अपने बालों को खोलकर दिलों पे बिजलियाँ गिराती हो,
माथे पे लगा के छोटी-सी बिंदी और आँखों से नशे के जाम पिलाती हो।
कानों में झुमके, होंठों पे मुस्कान सजाती हो,
कभी चूड़ियों की खनक से, कभी पायल की झंकार से दिल धड़काती हो।
तुम्हें क्या ख़बर, तुम्हारी एक नज़र का क्या असर होता है,
भूल जाता है वह शख़्स अपना वजूद, जिसे तुम अपना क़ातिलाना अंदाज़ दिखाती हो।
मंद-मंद मुस्कान पर तेरी, ख़ुदा भी अपनी ख़ुदाई भूल जाता है,
इंसानों की तो बात ही क्या, सुना है अप्सराओं को भी श्रृंगार रास पढ़ाती हो।
साड़ी में जब तुम यूँ लहराकर सामने आती हो,
हुस्न के बाग़ान में क़यामत-युक्त सुंदरता के सावन की बहार लाती हो।
न सजदा चाहिए, न कोई इबादत, बस तेरा दीदार काफ़ी है,
किसी मलंग की इबादत ही है तेरा हँसता चेहरा,
और तेरी नटखट मासूमियत से ही तू उसे कविताएँ लिखवाती हो।