और जब नज़र पड़ती है आसमान पर,
तो अनायास ही याद आ जाते हैं बचपन के वो खूबसूरत पल,
जब माँ के बगल में लेटे हुए
बादलों से बनने वाली भिन्न-भिन्न आकृतियों को खोजा करते थे।
जब सहोदरों से इस बात की रेस लगती थी
कि कौन सबसे अच्छी आकृति ढूँढ़ सकता है।
किसी को बादल में हाथी दिखाई देता,
किसी को घोड़ा,
तो कोई उसमें अपना कोई मनपसंद चेहरा खोज लिया करता था।
तब आसमान सिर्फ आसमान नहीं था,
वह हमारी कल्पनाओं की एक खुली किताब था,
जिसके हर पन्ने पर एक नई कहानी होती थी।
न कोई जल्दी थी,
न किसी मंज़िल की चिंता,
बस माँ का साथ था,
भाई-बहनों की हँसी थी
और सिर के ऊपर फैला हुआ
वो अनंत नीला आसमान।
समय बीत गया,
हम बड़े हो गए,
आसमान आज भी वहीं है
बस उसे देखने वाली वो आँखें
और उसके साथ बिताने वाला वो बचपन
कहीं पीछे छूट गया।
शायद इसलिए आज भी
जब कभी बादलों में कोई आकृति नज़र आती है,
तो मन कुछ पल के लिए ठहर जाता है
जैसे उम्र की सारी सीढ़ियाँ उतरकर
फिर उसी बचपन में पहुँच गया हो,
जहाँ छोटी-सी खुशी भी
पूरी दुनिया जितनी बड़ी हुआ करती थी।