इल्ज़ाम
कभी ख़ामोशी पर इल्ज़ाम आ गया,
कभी बेबसी पर इल्ज़ाम आ गया।
ना थी ख़ता फिर भी हम मुस्कुरा दिए,
जब-जब महफ़िल में हमारा नाम आ गया।
वो समझते रहे हुनर सादगी को मेरी,
मेरी वफ़ा पे ही हर इल्ज़ाम आ गया।
ज़माने ने पत्थर भी उठाए उस मोड़ पर,
जहाँ दिल को थोड़ा आराम आ गया।
अब शिकवा करें भी तो किससे करें,
जब अपनों का ही दिया पैग़ाम आ गया।