अगर वक्त मुझसे ठहरता...
अगर वक्त मुझसे ठहरता,
तो न बेवजह उसूलों पर ठहरता,
न दो-चेहरे समाज के रिवाजों पर।
वो ठहरता तो बस,
सौम्य इंसानों की परछाइयों पर ठहरता,
इंसानियत के अधूरे जवाबों पर ठहरता।
काश वक्त ठहरता, तो समझ के उस दो-मुहे रस्ते पर ठहरता,
जहाँ एक तरफ भीड़ है, और दूसरी तरफ सच।
--- by rakshita pal
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