मैं कुछ नहीं कहूँगा तुमसे
प्यार के बारे में
क्योंकि वह शब्दों में नहीं,
आत्मा में है,
कर्म में दुबका पड़ा है।
मैं नहीं कहूँगा तुमसे
साथ चलने को
सूक्ष्म-अँधेरी रात में।
नहीं कहूँगा
छाँव बैठने को
एकान्त में आने को
क्योंकि हमें साथ-साथ उत्पन्न होना है।
नहीं कहूँगा तुम्हें
सच बोलने को,
क्योंकि यह तुम्हारा पुण्य है।
आओ, गुनगुना लें
जीवन के चमत्कार को,
एकात्म होकर।
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*** महेश रौतेला