आसमान कभी सीमा था ही नहीं...
बादलों में कुछ ख़्वाब थे,
आँखों में कुछ अरमान,
हर रोज़ बदलता था मौसम,
फिर भी वही था आसमान।
पेड़ खड़ा था ख़ामोश-सा,
शाखों में था एक जहाँ,
जड़ें उसे थामे रहीं,
पर शाखों को मिली उड़ान।
फूलों ने काँटों के बीच
सीखा मुस्कुराना,
नदी ने पत्थरों से टकराकर
सीखा आगे बढ़ जाना।
पंछी ने पंख फैलाए,
न पूछा कोई फ़रमान,
उसे बस इतना मालूम था—
उड़ना ही उसकी पहचान।
मैं कैमरे में ये सब रखती रही,
रंग, मौसम और निशान,
फिर एक दिन ख़ुद से पूछा—
क्या सच में सबके लिए एक-सा है आसमान?
कुछ पंखों को उड़ना आता है,
फिर भी डरते हैं उड़ान से,
कुछ ख़्वाब जन्म तो लेते हैं,
पर डर जाते हैं अंजाम से।
तभी समझ आया
कुदरत ने तो कभी नहीं कहा
कि फूल कम खिलें,
पेड़ कम बढ़ें,
या पंछी कम उड़ें।
तो फिर किसने सिखाया
कि ख़्वाबों की भी हद होती है?
मैंने फिर आसमान की तस्वीर ली—
इस बार सिर्फ़ तस्वीर के लिए नहीं।
बल्कि याद रखने के लिए—
अरमानों की कोई सीमा नहीं,
उड़ान की कोई सीमा नहीं,
और आसमान…
कभी सीमा था ही नहीं।
~ आदया