शीर्षक: सरहद से इंतज़ार तक
लेखिका: निशा चौधरी
जब वर्दी पहनने की कसम ली जाती है, तो सिर्फ एक सिपाही सरहद पर नहीं जाता... उसके साथ उसका पूरा परिवार भी हर पल एक अनदेखी जंग लड़ता है।
एक तरफ देश का फर्ज और सरहद की ठंडी हवाएं, तो दूसरी तरफ घर के आंगन में जलता वो दिया, जो हर आहट पर चौखट की तरफ देखता है। यह सिर्फ एक फौजी की कहानी नहीं है, यह उस बेइंतहा मोहब्बत, हिम्मत और सब्र की दास्तान है जो 'इंतज़ार' के नाम से जानी जाती है।
क्या फर्ज की राह पर चलना आसान होता है? और क्या सिर्फ सरहद पर खड़े इंसान का ही इम्तिहान होता है या फिर उसका भी, जो हर रोज़ दिल पर हाथ रखकर मुस्कुराते हुए कहती है— "तुम बस देश का ख्याल रखना, तुम्हारा ख्याल रखने के लिए मेरी दुआएं काफी हैं..."
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