वो आवाज़ आज भी याद है,
रोज़ कानों में गूँजती है,
पास आकर फुसफुसाती है।
जब सोना चाहूँ,
तो सोने नहीं देती,
और जब सपने देखना चाहूँ,
तो सपने देखने नहीं देती।
वो नहीं चाहती
कि मैं उस काल्पनिक दुनिया का हिस्सा बन जाऊँ,
जिसमें और लोग
धीरे-धीरे समाते जा रहे हैं।
वो आवाज़ मेरे बचपन से मेरे साथ है,
शायद मुझे आज भी याद है—
वो मेरे जीवन के सबसे पसंदीदा इंसान की आवाज़ है।
शायद अब वो मेरे साथ
सिर्फ अपनी आवाज़ के सहारे है।
वो नहीं चाहती कि मैं
इन बंधनों में बँध जाऊँ,
वो चाहती है कि मैं
अपने पंख फैलाकर
इस आसमान में उड़ान भरूँ।
वो मुझसे कहती है—
इन सामाजिक आडंबरों में मत पड़ना,
वरना एक दिन
तुम खुद को ही कहीं खो दोगी।
वो डरती है
कहीं मैं खुद को न भूल जाऊँ,
कहीं दूसरों की बनाई हुई दुनिया में
अपनी दुनिया ही न खो दूँ।
और शायद इसीलिए…
वो आज भी मुझे रोकती है,
आज भी मुझे जगाती है,
आज भी मेरे सपनों को
एक नई दिशा दिखाती है।
वो आवाज़…
मुझे आज भी सुनाई देती है।