रातें भी अब मुझसे सवाल करती हैं,
तन्हाइयाँ हर रोज़ मलाल करती हैं।
कहती हैं — कहाँ गया वो हँसने वाला इंसान,
जिसकी आँखें कभी खुशियों से कमाल करती हैं।
अब हाल ये है कि खुद से भी नज़रें चुराता हूँ,
आईने में अपना ही चेहरा देखकर घबराता हूँ।
कभी जो सपनों का शहर बसाया था दिल में,
आज उसी शहर में अकेला खुद को पाता हूँ।
मगर फिर भी दिल में एक उम्मीद बाकी है,
टूटे हुए ख्वाबों की कोई ताबीर बाकी है।
शायद किसी मोड़ पर फिर मिल जाए सुकून,
शायद मेरी किस्मत में भी एक तदबीर बाकी है।
क्योंकि जिंदगी सिर्फ ग़म का नाम नहीं होती,
हर रात हमेशा नाकाम नहीं होती।
कभी तो चमकता है सितारा भी अंधेरों में,
हर कहानी हमेशा अधूरी तमाम नहीं होती।