मेरी मानसिकता मन से नहीं,
यह तो बीती हुई क्षण की अनमोल धरोहर है।
हां अनमोल धरोहर.....
क्योंकि इस वक्त में, मैं मुझसे बहुत दूर होती गए।
खुद की तलाश में इतनी दूर निकल गए,
जहां पर मेरा वजूद था ही नहीं।
भीतर की पुकार सुनकर भी सुनाई नहीं दी,
उस शोर में संवेदना कहीं दफन थी, भीतर में झांकना मुश्किल ही नहीं ना मुमकिन सा लगता था, माना मन का मौन बहारी शोर में दफन हो गया था। ओर रास्ता धुंधला हो गया था। "ऐसे में कैसे कोई खुद को संभाले?" अतीत के पन्ने को देखे तो में ऐसी थी ही नहीं जैसी में आज हु।
क्या ऐसा आप को भी लगता है?