कविता कैसे बदल जाते हैं रिश्ते
कवयित्री डॉ वंदना शर्मा
कैसे बदल जाते हैं रिश्ते
गैरों में कब बदल जाते हैं रिश्ते
क्या जरूरत ही किसी
रिश्ते की नींव होती है
एक मां अपने नवजात शिशु के लिए
रातों को जागती है
अपने शरीर को अनदेखा करती है
खुद का निवाला भी
पहले बच्चे को खिलाती है
चोट उसे लगती है
दर्द मां को होता है
वही बच्चा बड़ा होने पर
मां को बोझ समझता है
आजादी में बाधा समझता है
मां का बोलना
अब चुभने लगता है
मां का साथ अब पराया लगता है
जो बेटा रो पड़ता था
एक पल को जो न दिखाई दे मां
उसे बरसों हो जाते हैं
मां से बोले
मां भी धैर्य रख लेती है
बेटे की खुशी में चुप्पी रख लेती है
क्यों मां-बेटे का रिश्ता
एक उम्र के बाद अनजाना हो जाता है
मां का दर्द नाटक
मां का प्यार पराया हो जाता है
क्यों होता है ऐसा
जिस शिद्दत से
पालते हैं औलाद को मां-बाप
बेटे क्यों नहीं रह पाते
साथ उनके उसी प्यार से
जिंदगी की मजबूरियां है ये
या फर्ज से लापरवाही
संवेदनहीनता है ये
या आंखों पर पड़ा पर्दा
मां-बाप का दर्द नहीं दिखता
बस उनका पैसा ही दिखता
संतान क्या सिर्फ लेने के लिए है
बुढ़ापे में देखभाल की उम्मीद
करना क्या बेईमानी है
क्यूं होता है ऐसा
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
vandna.reporter@gmail.com