एक लड़की है अलवेली सी,
मस्तानी, कुछ मतवाली सी,
कृष्ण-सी नटखट अदाएँ लिए,
शर्मीली सी, भोली-भाली सी।
आँखें उसकी इतनी गहरी,
जो देखे, वो खो जाए,
भूलकर इस सारे संसार को,
बस उसकी आँखों में मदहोश हो जाए।
वाणी उसकी ऐसी मधुर,
जैसे बाँसुरी कोई प्रेम-राग सुनाए,
एक बार जो सुन ले उसको,
वो अपने ग़म-ए-दिल तमाम भूल जाए।
उसकी हँसी में ऐसी खनक,
जैसे राधा जी नूपुर खनकाएँ,
उसकी एक मुस्कान भर से,
पतझड़ में भी सावन उतर आए।
उसके होने भर से लगता है ऐसे,
मानो सावन भी प्रेम के गीत गाए,
हर बूँद उसकी याद में बरसे,
हर बादल उसका नाम दोहराए।
चाल उसकी कुछ ऐसी अल्हड़,
जैसे यमुना की लहरें बलखाएँ,
प्रेम में डूबी, मस्त-मगन,
जैसे कोई धुन प्रेम की गुनगुनाए।
वो गुज़रे तो हवाएँ ठहरें,
चाँद भी अपना नूर छुपाए,
फूलों को भी शर्म आ जाए,
जब वो पलकों से मुस्काए।
न जाने क्या जादू है उसमें,
जो दिल को अपना बना जाए,
एक लड़की है अलवेली सी,
जिसे देखे, वही मलंग हो जाए।