कभी-कभी शांत मस्तिष्क में ऐसे विचार आते हैं,
जैसे ठहरे हुए शांत दरिया में फेंका गया पत्थर।
पर जब चित्त हमेशा ही उथल-पुथल
और अस्थिर रहा हो,
तो अनायास किसी विचार के आने पर
उस पर क्या प्रभाव पड़ता होगा?
शायद कोई लहर नहीं उठती,
बस पानी थोड़ी देर को काँपता है
और फिर अपनी ही गहराई तलाशने लगता है।
गहरे जल में गिरा पत्थर
लहरें पैदा करता है,
किनारों तक पहुँचता है,
दूर तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है।
मगर उथले पानी में
वही पत्थर तल से टकराकर
बस एक क्षण को गाद उछालता है
पानी मटमैला होता है,
पर उसकी गहराई नहीं बढ़ती।
शायद विचार भी ऐसे ही होते हैं।
वे मन को बदलने नहीं आते,
वे तो बस यह दिखाने आते हैं
कि मन के भीतर कितना ठहराव है
और कितनी गहराई।
और जिस चित्त में हर समय हलचल हो,
वहाँ कोई विचार लहर बनने से पहले ही
एक और शोर में बदल जाता है।