सिर्फ मीठे से कहाँ व्यक्ति का पेट भरता है,
बिना तीखे के तो स्वाद भी कहाँ उभरता है।
जैसे भोजन में नमक, मिर्च और हल्दी का काम है,
वैसे ही इंसानी जीवन में सुख-दुख का काम है।
अगर सिर्फ सुख ही सुख की छांव होती यहाँ,
तो अपनों की असली पहचान होती कहाँ?
दुख की मिर्च जब आँखों में पानी लाती है,
तभी तो सुख की कीमत समझ में आती है।
मान का मीठा हलवा गर अभिमान बढ़ाता है,
तो अपमान का कड़वा घूंट जमीन पर लाता है।
ये खट्टा-मीठा, तीखा-नमकीन सा जो मेल है,
सच पूछो तो यही जिंदगी का असली खेल है।
बिना मसालों के जैसे भोजन में कोई बात नहीं,
बिना धूप-छांव के ढलती कोई रात नहीं।
हर रंग को हंसकर गले से लगाना सीख लो,
जिंदगी की थाली का पूरा आनंद उठाना सीख लो।