*चेतन किंतु जड़*
एक वृक्ष था पिता समान,
डालें जिसकी थीं संतान।
फूल-पत्तियों से खूब सजाया था,
अपनी शाखाओं पर सर्वस्व लुटाया था।
लगा दिया सारा जीवन जिनके पालन में,
पर शाखाएँ सदा कृतघ्न रहीं मन-ही-मन में।
वह वृद्ध वृक्ष फिर झुका लदा था,
वही हुआ जो हुआ सदा था।
टहनियों को वृक्ष से पृथक कर दिया, कुछ नियति ने कुछ नीति ने,
कुल्हाड़ी बनकर खुद ही काट दिया वृक्ष को शाखाओं की कुरीति ने।
पर शायद जड़ों को सुरक्षित रखा था अज्ञात प्रीति ने,
किंतु उन्हें भी कुंठित कर रखा है इसी भीति ने।
कुल्हाड़ी बनकर खुद ही काट दिया वृक्ष को शाखाओं की कुरीति ने।।
~ शौर्य अवस्थी