प्रातः काल गणेश वंदना
भोर भई अवधूत द्वार पर, किरणें अलख जगाती हैं,
मन मंदिर के बंद कपाटों को, हौले से खटखटाती हैं।
छोड़ो आलस, तजो निराशा, मंगल गान सुनाना है,
प्रथम पूज्य गजानन के चरणों में शीश झुकाना है।
ऋद्धि-सिद्धि के दाता तुम हो, विघ्नविनाशक नाम तुम्हारा,
सूंड सुंडाल, विशाल काय प्रभु, तुम ही जग का एक सहारा।
लड्डू का भोग सजे थाली में, मूषक की सवारी है,
मस्तक पर सिंदूर विराजे, छवि तुम्हारी न्यारी है।
बुद्धि विधाता, ज्ञान के सागर, सोई शक्ति जगा देना,
अंधकार जो मन में छाया, उसको दूर भगा देना।हाथ जोड़कर करें प्रार्थना, हे गौरीसुत दया करो,
सुबह की पहली इस वंदना से, जीवन खुशियों से भरो।