तड़प ऐसी है दिल में कि अब जिया नहीं जाता,
जुदाई का यह कड़वा ज़हर पीया नहीं जाता।
तू किस्मत में नहीं मेरी, ये सच कैसे मानूँ मैं,
तेरे बिन इस अकेलेपन को, अब कैसे गुज़ारूँ मैं?
हर एक लम्हा तेरी याद का, नश्तर-सा चुभता है,
बिना तेरे मेरा यह दम, घुट-घुट के निकलता है।
मिली ना मंज़िल-ए-उल्फ़त, मिटा सब आस का साया
मोहब्बत ने सिवा दर्द-ए-जुदाई, कुछ नहीं पाया।