"इंसानी वजूद"
नाज़ किस बात का करता है ऐ बंदे,
यह जिस्म तो मिट्टी की एक अमानत है।
तेरी असल अहमियत तेरे अलफ़ाज़ों में है,
वरना सांसें तो हर जानदार की आदत है।
किसी के गिरते हुए आंसुओं को पोंछ दे,
तो समझ कि तेरा होना साकार हुआ।
वरना आने-जाने के इस सिलसिले में,
कितने आए और कितनों का वजूद खाक हुआ।
वक्त रहते बांट ले थोड़ी खुशियां और सुकून,
कि इस ज़िंदगी का कोई ठिकाना नहीं।
कर ले कुछ ऐसे नेक काम इस जहान में,
कि जाने के बाद भी तुझे कोई भुला पाए नहीं।