तुम्हारा ख़त
तुम्हारा ख़त मिला,
तो लगा जैसे
बीता हुआ कल
फिर से दरवाज़े पर खड़ा है।
कुछ शब्द धुंधले थे,
कुछ अधूरे,
मगर हर पंक्ति में
तुम साफ़ दिखाई दिए।
ख़त छोटा था,
पर देर तक पढ़ती रही…
शायद इसलिए नहीं कि
उसमें बहुत कुछ लिखा था,
बल्कि इसलिए कि
जो नहीं लिखा था,
वो सब समझ आ गया।
~sheetal