अजीब सा दास्ताँ🐧
कहाँ से शुरू हुआ, कहाँ ले आया ये रास्ता,
कुछ समझ न आये, कैसा है ये अजीब सा दास्ताँ।
पलकों पे ख्वाब हैं, पर आँखों में थोड़ी हैरानी है,
दिल बोले अलग कहानी, दिमाग की अलग ही रवानी है।
कहीं खामोशी में गूंजती कोई बात है,
कहीं भीड़ में भी तन्हा लगती हर रात है।
वक्त आगे बढ़ रहा, या हम ठहरे हुए हैं?
अजीब से ये लम्हे, अजीब से ये सिलसिले हैं।
पर जो भी है, चलते रहने का नाम ही जिंदगी है! वैसे आज ये 'अजीब सी दास्ताँ' वाला मूड कैसे बना?🌿