Hindi Quote in Poem by Ahad Rayeen

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हृदय खोलते।

अपने मन को टटोलते,
यदि मेरे हृदय को खोलते।
आँखों में बेदर्दी ना जताते,
मेरे दरमियाँ आँसू तो बहाते।
अंश से दूरी मुझसे ना बनाते,
आगे बढ़कर त्रुटियों पे डाँटते।
दूरियाँ बढ़तीं समंदर सी ऐसे,
दो पाट खींचे मध्य नाव जैसे।
कंधे टूटे, छाप उभरी जहन पे,
यूँ कठोर स्नेह से गाढ़ा करते।
अपने मन को टटोलते,
यदि मेरे हृदय को खोलते।
बेरुखी बढ़ती जाती स्वार्थ से,
कुछ आपमें ज़्यादा, मेरी आपसे।
परिचित बंधन, जल, ज़मीं हमसे,
रक्षक, भक्षक, लहू प्यासे दोनों इसके।
सालों से जड़े मौन को तोड़ें,
हमारे दरमियाँ गुलाब रोपें।
अब त्वचा बिखरी है आपकी,
नादानी छोड़ें, नया रिश्ता जोड़ें।
जीवन को अनेक चयन सूझते जाते,
शांति और हिंसा—कौन सा अपनाते?
अपने मन को टटोलते,
यदि मेरे हृदय को खोलते।
©DSR

Hindi Poem by Ahad Rayeen : 112033139
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