वो
गिरता रहा, चढ़ता रहा,
प्रेम-पथ पर बढ़ता रहा।
कबीर नहीं, ग़ालिब नहीं,
तक़दीर का वह मालिक भी नहीं।
गुज़रा हुआ कल भी नहीं,
आने वाला कोई पल भी नहीं।
वह सबका है, सब उसके हैं,
किन्तु किसी के मुताबिक़ नहीं।
वह अस्त नहीं, वह व्यस्त नहीं,
जो हृदयस्थ है, वही सही।
- Anant Dhish Aman