बंधन
इंसानियत के बंधन टूट रहे,
न जाने इंसान क्या तराश रहे...।
जाति-धर्म का जाल बुन,
स्वयं को ही बांध रहे हैं...।
प्रेम-करुणा पन्नों में लिख,
स्वयं के अंदर घृणा भर रहे हैं...।
नद-नाले के आँसू बह रहे,
इंसान उन्हें खूबसूरत झरना बता रहा...।
फूलों की खुशबू स्वयं को तराश रही,
न जाने ये भंवरे फूलों का रस चुरा रहे...।
चिड़ियों की चीँ-चीँ सूनी-सूनी हो रही,
कोयल-कबूतर न जाने कहाँ जा रहे...।
पायल की खनक में कोई मधुर आवाज़ नहीं,
न जाने लोग किसकी आवाज़ सुन रहे...।
- एस.टी.डी. मौर्य ✍️