बेटी
बेटी कौन होती है?
शायद वह,
जो एक पुरुष के मन में भी
ममता जगा दे।
वह, जिसकी पायल की छन-छन
सूने पड़े आँगन को
संगीतमय कर दे।
वह,
जो अपनी भूख से पहले
पिता की थाली में रोटी तलाशे।
वह,
जो पिता के दुःख में
माँ-सा स्नेह बन जाए,
और उनके काँपते कंधों का
मौन सहारा बन जाए।
फिर क्यों उसे
"पराया धन" कह दिया जाता है?
क्यों न उसे
माता-पिता का अपना अंश कहा जाए?
पर मेरे मन में
एक सवाल बार-बार उठता है...
क्यों सिर्फ़ बेटों को ही
माँ-बाप के बुढ़ापे की लाठी कहा जाता है?
क्या बेटियाँ
अपने माता-पिता का सहारा नहीं बन सकतीं?
जो बचपन में
उनकी उँगली थामकर चलना सीखती हैं,
वही एक दिन
उनके काँपते हाथ भी थाम सकती हैं।
बेटी सिर्फ़ घर नहीं बसाती,
वह घर में धड़कनें बसाती है।
वह सिर्फ़ रिश्ते नहीं निभाती,
रिश्तों में अपनापन जगाती है।
सहारा बेटा या बेटी नहीं होता,
सहारा वह संतान होती है
जो हर परिस्थिति में
अपने माता-पिता का साथ निभाती है।
इसलिए बेटी को
"पराया धन" नहीं,
अपने जीवन का सबसे अनमोल अंश कहिए।
क्योंकि बेटी
किसी और के घर की नहीं होती,
वह जहाँ भी रहती है,
अपने संस्कारों से
एक नया घर बना देती है।