मैं एक के बाद एक किताबें पढ़ती जा रही थी
जीवन में जो कुछ भी घट रहा था वो सोच से परे था
तो सबकुछ भुला कर जीवन के अंत तक किताबों में डूब जाना चाहती थी...
न नींद आती थी, न मन कहीं और ठहरता था तो रोज़ एक नई किताब अपने आप शुरू हो जाती।
हाँ ये सच है कि कौन सी किताब पढ़नी है ये तय कर पाना मुश्किल काम था।
एक अजनबी रिश्ता इसे रोज़ पूरा करता और एक नया नाम ढूंढ कर दे देता जिसे मैं अगले 24 घंटे पढ़ने लगती।
रोशनी कब अंधेरे में घुल जाती पता ही नहीं चलता पर भीतर चल रहे द्वंद को रोक पाना थोड़ा मुश्किल हो जाता।
पर अच्छा लगता था जब महसूस होता कि वो किताब मैंने अकेले नहीं पढ़ी थी, भीतर कोई संग होता था हमेशा...
वही अजनबी जो रोज एक किताब ढूंढ कर दे रहा था अनजाने ही मेरे साथ हर शब्द को छूकर किताब को मेरे लिए पूरा कर रहा था।